विशेष पड़ताल | गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही में निजी स्कूलों की भर्ती प्रक्रिया जांच के घेरे में, शिक्षक योग्यता से लेकर चयन प्रक्रिया तक उठ रहे सवाल
गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही/सुनील शर्मा।
जिस शिक्षा व्यवस्था पर बच्चों का भविष्य संवारने की जिम्मेदारी है, उसी व्यवस्था में शिक्षकों की योग्यता और नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर सवाल खड़े हों, तो जवाबदेही तय होना जरूरी है। गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही जिले में डीएवी (DAV) प्रबंधन के स्कूलों में अतिथि (Guest) और तदर्थ (Ad-hoc) शिक्षकों की नियुक्तियों को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि कुछ पदों पर ऐसे व्यक्तियों को पढ़ाने की जिम्मेदारी दी गई है, जिनकी निर्धारित शैक्षणिक एवं व्यावसायिक योग्यताओं और शिक्षण अनुभव को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो मामला केवल भर्ती प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि स्कूलों में शैक्षणिक गुणवत्ता, विद्यार्थियों के हित और संबंधित अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करेगा।

सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या स्कूलों में नियुक्त शिक्षकों की योग्यता और आवश्यक प्रमाणपत्रों का नियमानुसार सत्यापन किया गया है? और यदि नहीं, तो इसकी जिम्मेदारी किसकी है?
‘गेस्ट’ और ‘एडहॉक’ नियुक्ति के नाम पर नियमों से छूट मिल सकती है?
शिक्षक की नियुक्ति स्थायी हो, संविदात्मक हो या अस्थायी—उस पर लागू योग्यता संबंधी नियम पद, कक्षा और संबंधित नियामकीय प्रावधानों के अनुसार तय होते हैं। केवल किसी पद को ‘गेस्ट’ या ‘एडहॉक’ नाम दे देने से लागू अनिवार्य योग्यताओं से स्वतः छूट नहीं मिल जाती।
शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 23 और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) के निर्धारित मानदंड शिक्षकों की न्यूनतम योग्यता के महत्वपूर्ण आधार हैं। वहीं, केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) से संबद्ध विद्यालयों को भी अपने ऊपर लागू संबद्धता नियमों का पालन करना होता है।
हालांकि, प्रत्येक पद के लिए B.Ed., D.El.Ed., TET या CTET की अनिवार्यता समान नहीं होती। यह संबंधित कक्षा, पद और लागू नियमों पर निर्भर करता है। इसलिए यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि संबंधित विद्यालयों में किन पदों पर नियुक्तियां की गईं, उन पदों के लिए कौन-सी योग्यताएं निर्धारित थीं और नियुक्त शिक्षकों के पास वे योग्यताएं थीं या नहीं।
यही वह बिंदु है, जिस पर शिक्षा विभाग की निष्पक्ष जांच पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट कर सकती है।
डिग्रीधारी युवा रोजगार की तलाश में, भर्ती प्रक्रिया पर पारदर्शिता के सवाल
जिले और प्रदेश में बड़ी संख्या में युवा शिक्षक बनने के लिए आवश्यक शैक्षणिक एवं व्यावसायिक योग्यताएं हासिल कर रोजगार की तलाश कर रहे हैं। ऐसे में निजी विद्यालयों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता का सवाल स्वाभाविक है।
यदि किसी विद्यालय में निर्धारित योग्यता पूरी नहीं करने वाले व्यक्तियों को शिक्षक नियुक्त किया गया है, तो यह जानना जरूरी होगा कि चयन किस आधार पर हुआ। क्या भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया गया था? क्या अभ्यर्थियों की योग्यता और अनुभव का सत्यापन किया गया? क्या चयन समिति ने निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया?
इन सवालों के जवाब दस्तावेजों और निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकते हैं। बिना प्रमाण किसी नियुक्ति को फर्जी या किसी चयन को मिलीभगत का परिणाम बताना उचित नहीं होगा, लेकिन शिकायतों की जांच से बचना भी व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल खड़े कर सकता है।
भारी फीस के बदले गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल रही है या नहीं?
निजी विद्यालयों में अभिभावक अपने बच्चों की बेहतर शिक्षा और उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद में फीस जमा करते हैं। ऐसे में शिक्षक की योग्यता, विषय पर पकड़ और पढ़ाने की क्षमता विद्यालय की शैक्षणिक गुणवत्ता के महत्वपूर्ण पहलू हैं।
यदि किसी स्कूल में निर्धारित मानकों के विपरीत नियुक्तियां हुई हैं, तो इसका असर विद्यार्थियों की पढ़ाई पर पड़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, केवल किसी शिक्षक की डिग्री को लेकर उठे सवालों के आधार पर उसकी शिक्षण क्षमता या विद्यार्थियों के शैक्षणिक नुकसान का निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं होगा।
इसलिए जरूरी है कि संबंधित विद्यालयों के शिक्षकवार योग्यता प्रमाणपत्र, नियुक्ति आदेश, विषयवार पदस्थापना और आवश्यक दस्तावेजों की जांच की जाए। इससे आरोपों की पुष्टि या खंडन तथ्यों के आधार पर हो सकेगा।
शिक्षा विभाग की निगरानी पर सवाल: क्या होगी दस्तावेजों की जांच?
इस पूरे मामले में जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय की भूमिका महत्वपूर्ण है। संबंधित विद्यालयों की मान्यता, संबद्धता और प्रशासनिक अधिकारों के दायरे में आने वाले विषयों पर विभाग को नियमों के अनुसार कार्रवाई करनी चाहिए।
जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग के सामने अब कुछ महत्वपूर्ण सवाल हैं:
- क्या संबंधित DAV विद्यालयों में कार्यरत शिक्षकों की निर्धारित शैक्षणिक एवं व्यावसायिक योग्यताओं का सत्यापन किया गया है?
- क्या अतिथि और तदर्थ शिक्षकों की नियुक्ति संबंधित पदों पर लागू नियमों के अनुरूप हुई है?
- क्या नियुक्ति आदेश, अनुभव प्रमाणपत्र और चयन प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेजों की जांच की जाएगी?
- यदि किसी नियुक्ति में नियमों का उल्लंघन सामने आता है, तो जिम्मेदार प्रबंधन और संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध नियमानुसार क्या कार्रवाई होगी?
- क्या अभिभावकों और आम नागरिकों की शिकायतों पर कोई जांच या कार्रवाई पहले से लंबित है?
इन सवालों का जवाब केवल औपचारिक बयान से नहीं, बल्कि दस्तावेजों की जांच और कार्रवाई की स्पष्ट जानकारी से मिलना चाहिए।
RTI और शिकायत के जरिए सामने आ सकते हैं तथ्य
यदि शिकायतकर्ता सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत संबंधित सार्वजनिक प्राधिकरण के पास उपलब्ध अभिलेखों की जानकारी मांगते हैं, तो लागू कानून और अपवादों के अधीन नियुक्ति प्रक्रिया, निरीक्षण रिपोर्ट, विभागीय कार्रवाई तथा उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड से जुड़े प्रश्नों पर जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
इसके लिए जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय से संबंधित विद्यालयों की जांच रिपोर्ट, प्राप्त शिकायतों पर की गई कार्रवाई और लागू नियमों के अनुपालन संबंधी उपलब्ध दस्तावेजों की मांग की जा सकती है। विद्यालय प्रबंधन से भी संबंधित नियुक्तियों और योग्यता सत्यापन के बारे में आधिकारिक जवाब मांगा जाना चाहिए।
यदि दस्तावेजों से अनियमितता प्रमाणित होती है, तो संबंधित सक्षम प्राधिकारी नियमानुसार कार्रवाई कर सकता है। जरूरत पड़ने पर शिकायतकर्ता उपलब्ध तथ्यों और कानूनी सलाह के आधार पर न्यायिक उपाय भी अपना सकते हैं।
अब जवाबदेही तय करने का समय
शिक्षा के क्षेत्र में किसी भी संस्था की प्रतिष्ठा से अधिक महत्वपूर्ण विद्यार्थियों का हित और नियमों का पालन है। यदि DAV विद्यालयों में शिक्षक नियुक्तियों को लेकर उठ रहे सवालों में तथ्य हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। वहीं, यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते, तो वास्तविक स्थिति भी सार्वजनिक होनी चाहिए, ताकि किसी संस्था या शिक्षक की छवि को निराधार आरोपों से नुकसान न पहुंचे।
अब निगाहें जिला शिक्षा अधिकारी और जिला प्रशासन पर हैं। क्या संबंधित विद्यालयों के शिक्षकवार दस्तावेजों का सत्यापन होगा? क्या भर्ती प्रक्रिया की जांच कर स्थिति स्पष्ट की जाएगी? या फिर ये सवाल जवाब का इंतजार करते रहेंगे?
बच्चों के भविष्य से जुड़े इस मामले में पारदर्शिता, निष्पक्ष जांच और जवाबदेही जरूरी है।
विद्यालय प्रबंधन और जिला शिक्षा विभाग का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी खबर में प्रमुखता से शामिल किया जाएगा।
Author: Man Tantra 24









