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फर्जी अंकसूची और RTE सीट आवंटन घोटाले में जांच रिपोर्ट के बाद भी चुप्पी: बलरामपुर शिक्षा विभाग में दोषियों पर मेहरबानी किसकी शह पर?

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फर्जी अंकसूची की शिकायत, आयुक्त का आदेश और फिर भी कार्रवाई पर सवाल! आखिर किसका इंतजार कर रहा शिक्षा विभाग?

बलरामपुर-रामानुजगंज में समतुल्यता अंकसूची और आरटीई सीट वृद्धि से जुड़ी कथित अनियमितताओं का मामला; 17 अप्रैल 2025 को सरगुजा संभाग आयुक्त ने मांगी थी जांच और कार्रवाई की रिपोर्ट, 20 मई 2026 को फिर जारी हुआ पत्र—अब सवाल, निर्देशों के पालन की जवाबदेही किसकी?

वाड्रफनगर/रामहरि गुप्ता l। विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़े दस्तावेजों में कथित अनियमितताओं की शिकायत हो, जांच के लिए उच्चाधिकारी निर्देश जारी करें और फिर भी कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट न हो—तो सवाल सिर्फ संबंधित कर्मचारियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की जवाबदेही पर उठता है। बलरामपुर-रामानुजगंज जिले के शिक्षा विभाग से जुड़ा समतुल्यता प्रमाण पत्र, कथित फर्जी अंकसूची जारी करने और आरटीई के अंतर्गत सीट वृद्धि से संबंधित मामला अब इसी जवाबदेही की कसौटी बनता दिखाई दे रहा है।

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उपलब्ध शासकीय पत्राचार के अनुसार, सरगुजा संभाग आयुक्त कार्यालय, अंबिकापुर ने 17 अप्रैल 2025 को जिला शिक्षा अधिकारी, बलरामपुर-रामानुजगंज को पत्र जारी कर शिकायत में उठाए गए बिंदुओं की गहन जांच तथा दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों के विरुद्ध नियमानुसार अनुशासनात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद भी कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करने वाले अंतिम आदेश सामने नहीं होने पर सवाल उठ रहे हैं।

मामले को और गंभीर बनाता है 20 मई 2026 का आयुक्त कार्यालय का पत्र। इस पत्र में जिला शिक्षा अधिकारी से पूछा गया है कि गंभीर शिकायत पर अब तक क्या कार्रवाई की गई। साथ ही, संबंधित तथ्यों की जांच कर तथ्यात्मक प्रतिवेदन और प्रासंगिक दस्तावेज सात दिवस के भीतर उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं।

यानी सवाल अब केवल शिकायत का नहीं, बल्कि शिकायत पर हुई कार्रवाई का हिसाब देने का भी है।

आयुक्त कार्यालय को दोबारा पत्र क्यों जारी करना पड़ा?

20 मई 2026 को जारी ज्ञापन क्रमांक E-Comp. No. 345518/File No. PUBR/1317/2026 में 17 अप्रैल 2025 के पूर्व पत्र का स्पष्ट संदर्भ दिया गया है। पत्र में शिकायतकर्ता छोटेलाल पैकरा, निवासी बंगालीपारा, गांधी नगर, अंबिकापुर, जिला सरगुजा द्वारा प्रस्तुत शिकायत की छायाप्रति संलग्न होने का उल्लेख है।

आयुक्त कार्यालय ने जिला शिक्षा अधिकारी को निर्देश दिया कि पूर्व संदर्भित पत्र पर अब तक की गई कार्रवाई और शिकायत में उल्लिखित तथ्यों की जांच कर तथ्यात्मक रिपोर्ट संबंधित दस्तावेजों के साथ सात दिनों के भीतर उपलब्ध कराई जाए।

यहां सबसे बड़ा प्रशासनिक सवाल है—यदि पहले ही जांच और कार्रवाई के निर्देश दिए जा चुके थे, तो एक वर्ष से अधिक समय बाद फिर से कार्रवाई का विवरण मांगने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या पहले दिए गए निर्देशों का समय पर पालन नहीं हुआ, या कार्रवाई हुई लेकिन उसकी रिपोर्ट उच्च कार्यालय तक नहीं पहुंची? दोनों ही स्थितियों में जवाबदेही तय होना जरूरी है।

हालांकि, उपलब्ध पत्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कोई कार्रवाई बिल्कुल नहीं हुई। लेकिन इतना जरूर है कि 20 मई 2026 के पत्र में आयुक्त कार्यालय ने अब तक की कार्रवाई और तथ्यात्मक रिपोर्ट दोबारा मांगी है। अब विभाग को दस्तावेजों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

कथित फर्जी अंकसूची: विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा सवाल

शिकायत और संबंधित जांच दस्तावेजों में समतुल्यता परीक्षा की अंकसूची तथा कक्षा पांचवीं और आठवीं की अंकसूचियों से जुड़ी कथित अनियमितताओं का उल्लेख है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, वर्ष 2021 से संबंधित कुछ अभिलेखों और अंकसूचियों की प्रक्रिया की जांच की गई थी।

जांच दस्तावेजों में सहायक ग्रेड-1 सह वरिष्ठ लिपिक राकेश कुमार पाल की भूमिका का उल्लेख मिलता है। इसी तरह सहायक जिला क्रीड़ा अधिकारी प्रेमेन्द्र बहादुर सिंह से कथित फर्जी समतुल्यता अंकसूची जारी करने के संबंध में स्पष्टीकरण मांगे जाने का भी उल्लेख है।

लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या संबंधित अंकसूचियों का मूल अभिलेखों से सत्यापन कराया गया? क्या जारी करने की प्रक्रिया में निर्धारित नियमों का पालन हुआ? क्या संबंधित कर्मचारियों के स्पष्टीकरणों पर विचार करने के बाद कोई अंतिम निष्कर्ष निकाला गया?

यदि अनियमितता प्रमाणित हुई है, तो जिम्मेदार व्यक्तियों पर नियमानुसार कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए। और यदि जांच में आरोप प्रमाणित नहीं हुए, तो उसका आधार भी दस्तावेजों के साथ स्पष्ट किया जाना चाहिए। किसी व्यक्ति को केवल शिकायत या प्रारंभिक जांच के आधार पर दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।

आरटीई सीट वृद्धि के प्रस्तावों में क्या सामने आया?

मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) के अंतर्गत सीट वृद्धि से संबंधित प्रस्ताव हैं। उपलब्ध जांच विवरण में तत्कालीन डाटा एंट्री ऑपरेटर सुनील कुमार जायसवाल की भूमिका तथा सीट वृद्धि के प्रस्तावों से संबंधित कार्यालयीन पत्रों का उल्लेख किया गया है।

इन दस्तावेजों के आधार पर यह जानना आवश्यक है कि संबंधित प्रस्ताव किस आधार पर तैयार किए गए, उनका परीक्षण किस अधिकारी ने किया और स्वीकृति की प्रक्रिया में किन-किन स्तरों पर जिम्मेदारी निर्धारित थी।

क्या प्रस्तावों और मूल अभिलेखों का स्वतंत्र सत्यापन हुआ? क्या जांच में कोई अनियमितता प्रमाणित हुई? यदि हुई, तो उसके लिए जिम्मेदार अधिकारी या कर्मचारी कौन पाया गया? और यदि मामला अभी भी लंबित है, तो लंबित रहने का कारण क्या है?

आरटीई से संबंधित प्रक्रियाएं बच्चों के प्रवेश और शिक्षा के अधिकार से जुड़ी हैं। इसलिए ऐसी शिकायतों की जांच केवल कागजी औपचारिकता बनकर नहीं रहनी चाहिए।

शिक्षा विभाग से सीधे सवाल—जवाब कौन देगा?

इस मामले में जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय और संभागीय प्रशासन को निम्न सवालों पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए:

1. 17 अप्रैल 2025 के निर्देशों पर क्या कार्रवाई हुई?
आयुक्त कार्यालय के निर्देश के बाद जांच की क्या स्थिति रही? क्या अंतिम जांच प्रतिवेदन तैयार हुआ और सक्षम अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया गया?

2. 20 मई 2026 को दोबारा रिपोर्ट क्यों मांगी गई?
क्या पहले भेजी गई रिपोर्ट अधूरी थी, कार्रवाई का विवरण उपलब्ध नहीं था या किसी अन्य कारण से दोबारा जानकारी मांगी गई? विभाग को इसका स्पष्ट जवाब देना चाहिए।

3. कथित फर्जी अंकसूचियों का सत्यापन किस स्तर पर हुआ?
क्या संबंधित अंकसूचियों, परीक्षा अभिलेखों, हस्ताक्षरों और जारी करने की प्रक्रिया का मूल दस्तावेजों से मिलान कराया गया?

4. संबंधित कर्मचारियों के स्पष्टीकरण पर क्या निर्णय हुआ?
क्या जवाबों के परीक्षण के बाद आरोप प्रमाणित हुए, निराधार पाए गए या जांच अब भी जारी है? इसका दस्तावेजी विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

5. आरटीई सीट वृद्धि के प्रस्तावों पर अंतिम निष्कर्ष क्या है?
क्या प्रस्तावों की प्रक्रिया में अनियमितता प्रमाणित हुई? यदि हां, तो जिम्मेदारी किस स्तर पर निर्धारित की गई?

6. सात दिनों के भीतर मांगी गई रिपोर्ट का क्या हुआ?
20 मई 2026 के पत्र में सात दिवस के भीतर तथ्यात्मक प्रतिवेदन मांगा गया था। क्या रिपोर्ट भेजी गई? यदि भेजी गई, तो उस पर आयुक्त कार्यालय ने क्या निर्णय लिया? यदि नहीं, तो देरी के लिए जवाबदेही किसकी है?

7. क्या मामले की वर्तमान स्थिति सार्वजनिक की जाएगी?
शिकायतकर्ता और आम जनता को यह जानने का अधिकार है कि जांच किस चरण में है, कौन-से निष्कर्ष निकले हैं और नियमानुसार आगे क्या कार्रवाई की गई है।

जांच के निर्देश देना पर्याप्त नहीं, पालन की निगरानी भी जरूरी

प्रशासनिक व्यवस्था में शिकायत प्राप्त होना, जांच के आदेश जारी होना और अंतिम कार्रवाई होना—तीनों अलग-अलग चरण हैं। किसी शिकायत पर पत्र जारी कर देना अपने आप में न्याय सुनिश्चित नहीं करता। वास्तविक जवाबदेही तब तय होती है, जब तथ्यों का परीक्षण हो, जिम्मेदारी निर्धारित की जाए और नियमानुसार निर्णय लिया जाए।

इस मामले में उपलब्ध पत्राचार यह सवाल खड़ा करता है कि उच्च कार्यालय के निर्देशों के बाद कार्रवाई की निगरानी किस स्तर पर हुई। यदि जिला स्तर पर जांच या कार्रवाई लंबित रही, तो उसकी वजह क्या थी? और यदि कार्रवाई पूरी हो चुकी है, तो उसका अंतिम आदेश सार्वजनिक रिकॉर्ड में स्पष्ट क्यों नहीं है?

इन सवालों का उत्तर अनुमान या आरोपों से नहीं, बल्कि मूल अभिलेखों, जांच प्रतिवेदन और अंतिम आदेश से मिलना चाहिए।

अब निगाहें जिला शिक्षा अधिकारी और संभाग आयुक्त कार्यालय पर

समतुल्यता अंकसूची, परीक्षा अभिलेखों और आरटीई सीट वृद्धि से संबंधित शिकायतों में निष्पक्ष जांच और समयबद्ध निर्णय आवश्यक हैं। उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर यह स्पष्ट है कि आयुक्त कार्यालय ने 17 अप्रैल 2025 को कार्रवाई के निर्देश दिए थे और 20 मई 2026 को जिला शिक्षा अधिकारी से अब तक की कार्रवाई का विवरण तथा तथ्यात्मक रिपोर्ट सात दिनों में मांगी थी।

अब संबंधित विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि इन निर्देशों के बाद क्या हुआ, जांच का अंतिम निष्कर्ष क्या है और यदि कोई कार्रवाई लंबित है तो उसका कारण क्या है।

सबसे बड़ा सवाल यही है—जब उच्चाधिकारी शिकायत पर जांच और कार्रवाई के निर्देश दे चुके हैं, तो जनता को अब तक पूरी और स्पष्ट स्थिति क्यों नहीं बताई गई?

यह मामला किसी व्यक्ति को बिना अंतिम निष्कर्ष के दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि प्रशासन से जवाबदेही मांगने का है। यदि आरोप सही हैं तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए; यदि आरोप प्रमाणित नहीं हैं तो संबंधित पक्ष को भी स्पष्ट रूप से दोषमुक्त किए जाने का आधार सामने आना चाहिए। शिक्षा विभाग की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है कि जांच का परिणाम, कार्रवाई की स्थिति और देरी के कारण तथ्यों के साथ सार्वजनिक किए जाएं।

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Author: Man Tantra 24

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