₹11.49 लाख की नाली आखिर किस जरूरत के लिए? क्या निर्माण स्थल का तकनीकी सर्वे सही हुआ था? क्या इतनी बड़ी राशि खर्च करने के पीछे पर्याप्त आबादी/जल निकासी की जरूरत थी? और मौके पर काम की गुणवत्ता स्वीकृत राशि के अनुरूप है या नहीं?
कोरिया/बैकुंठपुर/सुनील शर्मा। सरकारी पैसे से विकास कार्य होना अच्छी बात है, लेकिन जब विकास की जरूरत ही सवालों के घेरे में आ जाए तो मामला जांच का बन जाता है। कोरिया जिले के ग्राम पंचायत बंजारीडांड में सरगुजा विकास प्राधिकरण की राशि से बनाई गई करीब 300 मीटर लंबी सीसी नाली कुछ ऐसे ही सवाल खड़े कर रही है।
सूचना पटल के मुताबिक इस नाली निर्माण के लिए ₹11.49 लाख की स्वीकृति दी गई है। लेकिन मौके की स्थिति देखकर सबसे पहला सवाल यही उठता है—आखिर यह नाली बनाई किसके लिए गई?
300 मीटर सड़क… और सिर्फ एक घर!
जिस सड़क किनारे नाली का निर्माण कराया गया है, वहां करीब 300 मीटर के पूरे हिस्से में सिर्फ और सिर्फ एक घर है। यानी न कोई घनी बस्ती, न घरों की कतार और न ही बड़ी आबादी, जिसे नाली से जल निकासी की सुविधा मिल सके।
और मामला यहीं खत्म नहीं होता।
जिस एक घर का हवाला देकर इस नाली की जरूरत बताई जा सकती है, वहां से निकलने वाला पानी भी नाली की तरफ नहीं, बल्कि पीछे खेत की ओर जाता है।
तो फिर सवाल सीधा है—
जब नाली से जुड़ने वाले घर ही नहीं हैं, पानी का निकास भी दूसरी दिशा में है, तो ₹11.49 लाख खर्च कर यहां नाली बनाने का औचित्य क्या था?
जहां जरूरत थी, वहां नहीं… सुनसान हिस्से में क्यों?
सरकारी योजनाओं में आमतौर पर नाली का निर्माण उन जगहों पर किया जाता है जहां घरों की आबादी हो, बारिश या घरेलू पानी के निकास की समस्या हो और लोगों को उसका सीधा लाभ मिले।
लेकिन बंजारीडांड में जिस स्थान का चयन किया गया, वहां मौके की स्थिति ही पूरी योजना पर सवाल खड़े कर रही है।
क्या निर्माण से पहले स्थल का सर्वे हुआ था?
अगर हुआ था तो सर्वे करने वाले इंजीनियर को यहां कितने घर दिखाई दिए?
क्या यह भी देखा गया कि पानी आखिर जाएगा कहां?
और अगर ये सब देखा गया था तो फिर इसी स्थान को नाली निर्माण के लिए क्यों चुना गया?
₹11.49 लाख की नाली… मौके पर कितने की जरूरत?
करीब 300 मीटर लंबी नाली के लिए ₹11.49 लाख की स्वीकृति है। यानी औसतन करीब ₹3,830 प्रति मीटर।
अब सवाल सिर्फ रकम का नहीं है। सवाल यह है कि इस रकम से जो निर्माण हुआ, वह वास्तव में कितना उपयोगी है?
मौके पर नाली की गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। निर्माण की स्थिति को देखकर इसकी मजबूती और टिकाऊपन पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। यदि निर्माण के कुछ ही समय बाद नाली में मिट्टी भरने लगे या उसका जल निकासी के लिए प्रभावी उपयोग ही न हो, तो फिर इतनी राशि खर्च करने का उद्देश्य क्या रह जाता है?
असली जांच यहां से शुरू होनी चाहिए
इस पूरे मामले में सिर्फ मौके पर जाकर नाली देख लेना पर्याप्त नहीं होगा। असली तस्वीर तो सरकारी दस्तावेज सामने रखेंगे।
तकनीकी स्वीकृति क्या कहती है?
एस्टीमेट में नाली की लंबाई, चौड़ाई और गहराई कितनी तय थी?
एमबी में कितना काम दर्ज किया गया?
कितनी राशि का भुगतान हुआ?
काम का मूल्यांकन किस अधिकारी ने किया?
और सबसे अहम—निर्माण स्थल का चयन किस आधार पर किया गया?
इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही पता चलेगा कि ₹11.49 लाख की यह नाली वास्तव में जनहित का निर्माण है या सिर्फ कागजों पर विकास का एक और उदाहरण।
अब जिम्मेदारों से जवाब जरूरी
बंजारीडांड की यह नाली इसलिए चर्चा में है क्योंकि यहां सवाल सिर्फ गुणवत्ता का नहीं है, बल्कि जरूरत, स्थल चयन और सरकारी राशि के इस्तेमाल का है।
300 मीटर सड़क, सिर्फ एक घर और ₹11.49 लाख की नाली—आखिर इस निर्माण का लाभ किसे मिल रहा है?
अब निगाहें ग्राम पंचायत से लेकर तकनीकी अधिकारियों पर हैं। यदि निर्माण पूरी तरह नियमों और मापदंडों के अनुसार हुआ है, तो संबंधित विभाग को स्वीकृति, एस्टीमेट, एमबी और भुगतान का रिकॉर्ड सार्वजनिक कर इन सवालों का जवाब देना चाहिए।
क्योंकि जनता का सवाल बेहद सीधा है—
“जब नाली की जरूरत ही नजर नहीं आती, तो ₹11.49 लाख की यह नाली आखिर बनी क्यों?”
Author: Man Tantra 24









