विरासत पर ‘विकास’ का हथौड़ा? कंक्रीट निर्माण से बदल रहा दुर्गाधारा जलप्रपात का प्राकृतिक स्वरूप
गौरेला | विशेष रिपोर्ट: अमित जायसवाल
प्रदेश और जिले के सबसे सुंदर, प्राचीन और आस्था के केंद्र ‘दुर्गाधारा जलप्रपात’ की प्राकृतिक आत्मा को विकास के नाम पर कुचला जा रहा है। जिस जलप्रपात को इसकी नैसर्गिक सुंदरता और विशाल चट्टानों के बीच से बहते निर्मल पानी के लिए जाना जाता था, उसे अब DMF (डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन) फंड और प्रशासनिक लापरवाही के जरिए एक ‘संकुचित नाले’ में तब्दील करने की तैयारी कर ली गई है।
ग्राउंड जीरो की स्थितियां साफ़ जाहिर करती हैं कि सालों पुराने प्राकृतिक कुंड को कंक्रीट से पाटकर छोटा किया जा रहा है। नदी के प्रवाह को सीमेंट की दीवारों के बीच कैद कर उसे एक नाले और पुलिया का रूप दिया जा रहा है।
💔 प्राकृतिक सुंदरता पर क्रूर प्रहार: कैसे नष्ट हो रहा है स्वरूप?

जब हमारी टीम ने मौके का मुआयना किया, तो वहां की तस्वीरें डराने वाली थीं। ‘विकास’ के नाम पर ये ३ बड़े ब्लंडर किए जा रहे हैं:
- ⚠️ कुंड का अस्तित्व संकट में: वह सुंदर जलप्रपात, जहाँ पानी प्राकृतिक चट्टानों पर गिरकर दूधिया झाग बनाता था, अब भारी निर्माण सामग्री, गिट्टी और कंक्रीट के मलबे से घिर चुका है।
- ⚠️ नदी को बना दिया नाला: नदी के चौड़े और प्राकृतिक पाट को घटाकर कृत्रिम चैनल (सीमेंट की संकरी दीवारें) बनाया जा रहा है। इससे नदी की चौड़ाई बेहद कम हो रही है और उसका प्राकृतिक स्वरूप पूरी तरह नष्ट हो रहा है।

- ⚠️ सीमेंट-कंक्रीट का बेजान जाल: जो प्रवाह पूरे बारह महीने प्राकृतिक पत्थरों के बीच से कल-कल कर बहता था, वह अब महज कंक्रीट के नाले में दबकर रह जाएगा।
🤨 जिम्मेदार अधिकारियों की विचित्र दलीलें: “दान” के नाम पर सार्वजनिक धरोहर से खिलवाड़?
इस गंभीर मामले में आरईएस (RES) विभाग के प्रभारी SDO विजयेंद्र बलभद्रे की दलीलें हैरान करने वाली हैं और प्रशासन पर कई बड़े सवाल खड़े करती हैं:
दलील 1: निजी दान से निर्माण
विभाग का कहना है: प्रपात के पास का मुख्य काम किसी व्यक्ति द्वारा ‘दान’ के रूप में कराया जा रहा है।
🧐 जनता का सवाल: क्या कोई भी रसूखदार व्यक्ति अपना पैसा खर्च करने के नाम पर हमारे जिले की शान और ऐतिहासिक पर्यटन स्थल की प्राकृतिक सुंदरता को नष्ट करने का अधिकार रखता है? क्या इसके लिए प्रशासन से अनुमति ली गई?
दलील 2: पाइपलाइन का बहाना
विभाग का कहना है: मुख्य सड़क के नीचे पाइपलाइन में कचरा जाम होता है, इसलिए इस नाले का निर्माण किया जा रहा है ताकि पानी सीधे बह सके।
🧐 जनता का सवाल: क्या कचरा प्रबंधन का एकमात्र समाधान नदी के प्राकृतिक सौंदर्य की बलि देना और उसे नाला बना देना है?
😡 पहले सीसी पगडंडी, अब कुंड पर कब्जा: जागरूक नागरिकों में आक्रोश
यह पहली बार नहीं है जब दुर्गाधारा के साथ ऐसा क्रूर मजाक हुआ हो। स्थानीय जागरूक नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों का आक्रोश फूट पड़ा है। उनका कहना है:
- पूर्व में भी दुर्गा धारा मंदिर के बगल में सीसी पगडंडी बनाकर नदी के प्रवाह की चौड़ाई को कम किया जा चुका है।
- अब कुंड और प्रपात के ठीक सामने का यह कंक्रीट निर्माण इस ऐतिहासिक पर्यटन स्थल की अंतिम पहचान भी छीन लेगा।
❓ चुभते सवाल: जनता मांग रही है जवाब!
वेब पोर्टल के माध्यम से हम जिला प्रशासन और जिम्मेदार मंत्रियों से ये सीधे सवाल पूछते हैं:
- क्या पर्यटन स्थलों को उनके प्राकृतिक रूप में रहने देना विकास का हिस्सा नहीं है?
- क्या कंक्रीट बिछाना और सीमेंट की दीवारें खड़ी करना ही आधुनिक विकास की एकमात्र परिभाषा है?
- क्या प्रशासन इस बात की खुली छूट देगा कि कोई भी व्यक्ति अपनी मर्जी से जिले की प्राकृतिक और सांस्कृतिक विरासतों की भौगोलिक संरचना बदल दे?
🛑 निष्कर्ष: बेजान ढांचा बनने से बचाइए दुर्गाधारा को!
दुर्गाधारा जैसे प्राकृतिक स्थल हमारी सांस्कृतिक और भौगोलिक पहचान हैं, कोई सीमेंट के पार्क नहीं। कंक्रीट का यह ‘तथाकथित विकास’ आने वाले समय में केवल एक बेजान ढांचा बनकर रह जाएगा और सैलानी यहाँ आना बंद कर देंगे।
गौरेला की जनता और पर्यावरणविदों की प्रशासन से पुरजोर मांग है कि इस कंक्रीट निर्माण को तुरंत प्रभाव से रोका जाए और जलप्रपात को उसके प्राकृतिक, मौलिक और प्राचीन स्वरूप में ही सुरक्षित रखा जाए।
💬 आपकी क्या राय है?
नीचे कमेंट बॉक्स में बताएं: क्या विकास के नाम पर प्राकृतिक जलप्रपातों को कंक्रीट में बदलना सही है? इस खबर को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि सोए हुए प्रशासन की नींद खुले!
Author: Man Tantra 24











