एसडीएम न्यायालय ने 14 जनवरी के आदेश को किया निरस्त, गलत जानकारी और त्रुटिपूर्ण जांच प्रतिवेदन को माना अहम कारण; अब आगे की कार्रवाई पर टिकी निगाहें
बैकुंठपुर/सुनील शर्मा। आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासी के नाम हस्तांतरित किए जाने से जुड़े एक मामले में एसडीएम राजस्व बैकुंठपुर न्यायालय ने महत्वपूर्ण कार्रवाई करते हुए 14 जनवरी 2026 को पारित आदेश को 21 अगस्त 2026 को निरस्त कर दिया है। मामले की दोबारा जांच में पुराने राजस्व प्रतिवेदन में कई महत्वपूर्ण विसंगतियां सामने आईं।

मामला ग्राम पौड़ी स्थित खसरा नंबर 1241/4 की 0.100 हेक्टेयर भूमि से जुड़ा है। इस भूमि के संबंध में पहले धारा 170(ख) के तहत कार्रवाई करते हुए गैर-आदिवासी पक्ष के नाम हस्तांतरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने वाला आदेश पारित किया गया था।
इस मामले को लेकर 16 फरवरी 2026 को हमारे द्वारा खबर प्रकाशित कर दस्तावेजों और पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे। उस समय यह भी कहा गया था कि यदि आदिवासी भूमि के हस्तांतरण के लिए गलत जानकारी अथवा कूटरचित दस्तावेजों का सहारा लिया गया है तो पूरे मामले की गंभीरता से जांच आवश्यक है।

दोबारा जांच में सामने आई अलग तस्वीर
21 अगस्त को पारित आदेश में एसडीएम न्यायालय ने पुराने और वर्तमान राजस्व निरीक्षक की रिपोर्ट का परीक्षण किया। आदेश में उल्लेख है कि पुराने प्रतिवेदन में भूमि पर 40-50 वर्षों से मकान और बाड़ी होने की बात कही गई थी, जबकि वर्तमान जांच में ऐसी स्थिति सामने नहीं आई।

जांच में यह भी सामने आया कि संबंधित भूमि पर पहले कोई मकान नहीं था और वर्तमान में वहां अलग-अलग कमरों का निर्माण तथा व्यावसायिक उपयोग किए जाने की बात सामने आई।
न्यायालय ने पुराने राजस्व निरीक्षक के प्रतिवेदन को गलत/त्रुटिपूर्ण माना और यह भी स्पष्ट किया कि मामले में छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 170(ख) की उपधारा-3 लागू नहीं होती।
इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए 14 जनवरी 2026 को पारित आदेश को निरस्त कर दिया गया।
राजस्व रिकॉर्ड में नाम सुधारने के निर्देश
21 अगस्त के आदेश में तहसीलदार पौड़ी-बचरा को निर्देशित किया गया है कि संबंधित भूमि के राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज गैर-आदिवासी पक्ष का नाम विलोपित करते हुए आदिवासी पक्ष दानी टोप्पो के नाम पूर्ववत करने की कार्रवाई की जाए।
आदेश में संबंधित लेन-देन में ₹7.34 लाख की राशि का भी उल्लेख है और गैर-आदिवासी पक्ष को राशि वापस करने के निर्देश दिए गए हैं।
प्रशासन की कार्रवाई सराहनीय, लेकिन अब आगे की जांच भी जरूरी
इस पूरे मामले में सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि शिकायत/जानकारी सामने आने के बाद मामले की दोबारा जांच कराई गई और जांच में सामने आई विसंगतियों के आधार पर पूर्व आदेश को निरस्त किया गया। इससे यह संदेश जाता है कि यदि राजस्व प्रक्रिया में कोई त्रुटि सामने आती है तो प्रशासन उस पर पुनर्विचार कर सुधारात्मक कार्रवाई कर सकता है।
एसडीएम न्यायालय द्वारा की गई इस कार्रवाई की सराहना की जानी चाहिए।
हालांकि, इस मामले में अब कुछ सवाल ऐसे भी हैं जिन पर आगे कार्रवाई होने से न केवल इस प्रकरण का पूरी तरह समाधान हो सकता है, बल्कि आदिवासी जमीन के नाम पर काम करने वाले संभावित भूमाफिया या बिचौलियों पर भी प्रभावी शिकंजा कसा जा सकता है।
अब आगे इन बिंदुओं पर भी ध्यान देने की जरूरत
पहला, यदि दस्तावेजों की जांच में यह प्रमाणित होता है कि न्यायालय के समक्ष कूटरचित दस्तावेज या गलत शपथपत्र प्रस्तुत किए गए थे, तो संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की कानूनी और आपराधिक जांच कराई जानी चाहिए।
दूसरा, मामले में सामने आई ₹7.34 लाख की राशि के लेन-देन और उसके स्रोत की भी जांच की जाए, ताकि पूरा वित्तीय पक्ष स्पष्ट हो सके।
तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण, धारा 170(ख) के मूल उद्देश्य के अनुरूप यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि यदि पूर्व में आदिवासी भूमि का हस्तांतरण ही नियमों के विपरीत पाया जाता है, तो भूमि वास्तव में कानून के अनुसार उसके मूल आदिवासी भूमिस्वामी अथवा वैध उत्तराधिकारियों तक पहुंचे।
चौथा, ऐसे मामलों में पुराने राजस्व रिकॉर्ड, पंचनामा, पटवारी प्रतिवेदन, राजस्व निरीक्षक की रिपोर्ट और न्यायालय में प्रस्तुत शपथपत्रों का आपस में मिलान कर जांच की व्यवस्था और मजबूत की जाए।
इससे भविष्य में कोई व्यक्ति गलत दस्तावेज या गलत जानकारी के आधार पर आदिवासी भूमि के हस्तांतरण की प्रक्रिया का लाभ उठाने की कोशिश करे तो उसे शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सकेगा।
मुद्दा किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, व्यवस्था को मजबूत करने का है
आदिवासी भूमि संरक्षण से जुड़े मामलों में प्रशासन की एक छोटी-सी जांच भी जमीन के वास्तविक हकदार के अधिकार को बचा सकती है। इस मामले में पूर्व आदेश का निरस्त होना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण कार्रवाई है। अब यदि दस्तावेजों में सामने आए अन्य पहलुओं की भी निष्पक्ष जांच कर आवश्यक कार्रवाई की जाती है, तो यह मामला आदिवासी भूमि की सुरक्षा और राजस्व व्यवस्था में पारदर्शिता का एक बेहतर उदाहरण बन सकता है।
प्रशासन ने एक महत्वपूर्ण सुधारात्मक कदम उठाया है। अब आगे की कार्रवाई यह तय करेगी कि इस मामले से जुड़े सभी सवालों का पूरा समाधान होता है या नहीं।
Author: Man Tantra 24









