विशेष रिपोर्ट: मासूमों की किलकारी के बगल में सुनाई देगी अब ‘मरघट’ की खामोशी? कोरिया प्रशासन के फैसले पर उठे सवाल!
पोंडी/कोरिया/सुनील शर्मा: क्या विकास की अंधी दौड़ में जिला प्रशासन मानवीय संवेदनाओं को भूल गया है? आपकी अपनी पत्रिका ‘मन-तंत्र’ को सूत्रों के हवाले से मिली एक एक्सक्लूसिव जानकारी ने पूरे इलाके में हड़कंप मचा दिया है। तहसील पोंडी के एक ऐसे रिहायशी इलाके में शव गृह (Mortuary) बनाने की तैयारी चल रही है, जहाँ सुबह की शुरुआत बच्चों की प्रार्थना और मंदिरों की घंटियों से होती है।
शिक्षा के मंदिर और आस्था के केंद्र पर ‘संकट’
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प्रशासन ने जिस जगह का चयन किया है, वह कोई वीरान इलाका नहीं, बल्कि पोंडी की धड़कन है। इसके चारों ओर का भूगोल देखकर आप हैरान रह जाएंगे:
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- पीछे का हिस्सा: सरस्वती शिशु मंदिर (नर्सरी से कक्षा 8वीं तक के मासूम बच्चे)।
- दूसरा किनारा: कन्या माध्यमिक विद्यालय और बालक प्राथमिक/माध्यमिक शाला।
- तीसरा किनारा: कई प्राचीन और प्रतिष्ठित मंदिर।
- चौथा किनारा: गांव की आस्था का केंद्र ‘देवगुड़ी मंदिर’, जहाँ स्वयं पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल मत्था टेक चुके हैं।
बड़ा सवाल: जिस रास्ते से मासूम बच्चे स्कूल जाते हैं और ग्रामीण पूजा-अर्चना के लिए निकलते हैं, क्या उसी रास्ते से अब रोज लाशें गुजरेंगी? क्या बच्चों के कोमल मन पर इस ‘शव गृह’ का मनोवैज्ञानिक असर नहीं पड़ेगा?

वर्दी वालों की उपेक्षा, मृतकों पर मेहरबानी?
हैरानी की बात यह है कि जिस जर्जर भवन (पुरानी पुलिस चौकी) को अनुपयोगी बताकर खाली कराया गया था, वहां आज भी पुलिस कर्मी अपनी जान जोखिम में डालकर रह रहे हैं। प्रशासन के पास इन जीवित रक्षकों के लिए नया आवास बनाने का बजट या योजना नहीं है, लेकिन उसी घनी बस्ती के बीचों-बीच मुर्दाघर बनाने के लिए पूरी तत्परता दिखाई जा रही है।
ग्रामीणों में आक्रोश की लहर
स्थानीय निवासियों और ग्रामीणों का कहना है कि वे इस फैसले का पुरजोर विरोध करेंगे। ग्रामीणों का तर्क है कि:
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- संक्रमण का खतरा: भीड़भाड़ वाले इलाके में शवों के रख-रखाव से बीमारी और संक्रमण फैलने की आशंका है।
- मानसिक दबाव: स्कूल के ठीक बगल में शवों का आना-जाना बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए घातक है।
- आस्था को ठेस: देवगुड़ी जैसे पवित्र स्थल के पास इस तरह का निर्माण धार्मिक भावनाओं के खिलाफ है।
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मन-तंत्र का तीखा सवाल
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- क्या जिला प्रशासन के पास पूरे पोंडी तहसील में शव गृह के लिए कोई अन्य सुरक्षित या निर्जन स्थान नहीं बचा?
- क्या अधिकारियों ने इस स्थल चयन से पहले वहां के स्कूलों और मंदिरों की दूरी का भौतिक सत्यापन किया है?
- जिंदा पुलिसकर्मियों के लिए जर्जर छत और मृतकों के लिए रिहायशी इलाके में आलीशान शव गृह—यह कैसा न्याय है?
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अब देखना होगा कि क्या जनभावनाओं को ताक पर रखकर यहाँ ईंटें गाड़ी जाएंगी, या प्रशासन अपनी गलती सुधारते हुए पुलिसकर्मियों के लिए बेहतर आवास और बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण सुनिश्चित करेगा।
बने रहिए ‘मन-तंत्र’ के साथ, हम उठाएंगे आपकी आवाज।
Author: Man Tantra 24










