काग़ज़ थे पूरे, फिर भी लूट लिया गया किसान” – एमसीबी में खाद्य अधिकारी पर गंभीर आरोप, ₹50,000 घूस की मांग और धान जब्ती का मामला,तानाशाह अधिकारी के कारण किसान का नहीं बिका धान,कौन जिम्मेदार??

एमसीबी/ जनकपुर /सुनील शर्मा
छत्तीसगढ़ में धान खरीदी की आखिरी तारीख 30 जनवरी तय थी और खाद्य अधिकारी की दादागिरी के कारण किसान अपनी धान बेचने से वंचित रह गया। इस मामले ने सिस्टम की संवेदनशीलता और ईमानदारी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। किसान प्रदीप यादव का आरोप है कि सभी वैध कागजात और प्रशासनिक सत्यापन के बावजूद एक खाद्य अधिकारी ने नशे की हालत में उनकी धान से भरी गाड़ी जब्त कर ली और ₹50,000 की रिश्वत की मांग की।

भौतिक सत्यापन हुआ, प्रशासन ने दी अनुमति – फिर भी “अवैध धान” का आरोप

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धान खरीदी प्रक्रिया के तहत प्रदीप यादव ने टोकन कटवाया था। टोकन कटाने के बाद प्रशासनिक टीम उनके घर पहुंची और धान का भौतिक सत्यापन किया।
भौतिक सत्यापन में यह पुष्टि की जाती है कि किसान के पास वास्तव में धान मौजूद है और वह बाहर से धान लाकर सरकारी खरीदी में नहीं खपा रहा है। सत्यापन के बाद अधिकारी द्वारा लिखित रिपोर्ट और रसीद भी दी गई। यानी प्रशासनिक रूप से किसान का धान पूरी तरह वैध घोषित हो चुका था।

खरीदी केंद्र में पहुंचते ही अधिकारी का तांडव


23 जनवरी 2026 को प्रदीप यादव अपनी धान से भरी गाड़ी लेकर धान खरीदी केंद्र पहुंचे। आरोप है कि उसी समय एक खाद्य अधिकारी नशे की हालत में वहां पहुंचा और सीधे कह दिया—
“तुम्हारा धान अवैध है, गाड़ी जब्त होगी।”
किसान ने जब भौतिक सत्यापन के कागजात दिखाए, तो अधिकारी ने कथित तौर पर कहा—
“तुम्हारे कागज़ मेरे किसी काम के नहीं हैं।”
इसके बाद चाकू दिखाकर धान और गाड़ी जब्त कर थाने ले जाने का आरोप लगाया गया।

₹50,000 दो और धान ले जाओ – खुलेआम रिश्वत की मांग का आरोप

सबसे गंभीर आरोप यह है कि थाने ले जाते समय रास्ते में अधिकारी ने किसान से ₹50,000 की मांग की और कहा—“₹50,000 दे दो, धान ले जाओ।” किसान ने अपनी असमर्थता जताते हुए कहा कि उसके पास पैसे नहीं हैं और सभी वैध कागजात हैं, इसलिए रिश्वत देने का कोई कारण नहीं। आरोप है कि इसी बात से नाराज होकर अधिकारी ने गाड़ी को कोटाडोल थाने में खड़ा करा दिया, जिससे किसान पूरी तरह बेबस हो गया।

तहसीलदार–एसडीएम से शिकायत, लेकिन कोई सुनवाई नहीं

किसान ने तहसीलदार और एसडीएम से शिकायत की, लेकिन कथित तौर पर उसे किसी भी तरह का समर्थन नहीं मिला। आखिरकार थका-हारा किसान 29 जनवरी को एमसीबी जिला कलेक्ट्रेट पहुंचा और कलेक्टर के सामने अपनी आपबीती रखी।  किसान प्रदीप यादव का कहना है कि धान खरीदी का समय निकल गया हैं अब धान सहकारी समिति में नहीं बिक पाया हैं, जिससे उसे लाखों रुपये का नुकसान उठाना पड़ेगा ।“साहब, मेरी मेहनत की भरपाई कौन करेगा? मेरा क्या कसूर है? सभी नियमों का पालन किया, फिर भी मुझे लूटा गया।”

कलेक्टर से न्याय की गुहार – दोषी अधिकारी से भरपाई की मांग

किसान ने कलेक्टर से मांग की है कि
संबंधित खाद्य अधिकारी पर सख्त कार्रवाई की जाए,हुए नुकसान की भरपाई उसी अधिकारी से कराई जाए
किसानों को डराने और रिश्वत मांगने वाले अधिकारियों पर उदाहरणात्मक कार्रवाई हो।

सवाल सिस्टम से: किसान की हार या अहंकार की जीत?
यह मामला सिर्फ एक किसान का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की संवेदनशीलता की परीक्षा है।
क्या प्रशासन एक गरीब किसान को न्याय दिला पाएगा? या फिर नियमों को ताक पर रखने वाले अहंकारी अधिकारी की मनमानी चलती रहेगी?
धान उगाने में महीनों की मेहनत, लागत, कर्ज और जोखिम होता है। अगर अंत में किसान को ही लूटा जाए, तो फिर “किसान हितैषी सरकार” का दावा किसके लिए है? अब सबकी नजरें एमसीबी जिला प्रशासन पर हैं—
क्या न्याय होगा या सिस्टम फिर एक किसान को रौंद देगा?
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Author: mantantra24

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