“स्वास्थ्य मंत्री की प्रेस वार्ता में पत्रकार का स्वास्थ्य बिगड़ा – जेब से ₹300 उड़ गए!”

पोड़ी (जिला मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर, छत्तीसगढ़):
जब मंच पर स्वास्थ्य मंत्री महोदय जनता को बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था के वादे कर रहे थे, ठीक उसी समय एक पत्रकार की जेब से व्यवस्था की नब्ज़ ₹300 लेकर रफूचक्कर हो गई। जी हां, एक सच्चे लोकतंत्र की पहचान यही तो है – भाषण मंच पर चलता रहे और जेबें मैदान में खाली होती रहें।
पत्रकार अरुण अग्रवाल, जो कि एक मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि से आते हैं, 21 जुलाई 2025 को स्वास्थ्य मंत्री श्री श्याम बिहारी जायसवाल की प्रेस वार्ता को कवर करने पहुंचे थे। लेकिन खबर लेने निकले अरुण जी खुद “खबर” बन गए। कार्यक्रम के दौरान उनकी जेब से ₹300 गायब हो गए – और वो भी इतनी साफ़-सुथरी सफ़ाई से कि सफाई कर्मचारी भी शरमा जाएं।

अब सोचिए, जब एक पत्रकार जो खुद जनता की आवाज़ उठाता है, उसकी जेब सुरक्षित नहीं, तो आम जनता की सुरक्षा कितनी ‘सुनिश्चित’ है, यह अंदाजा लगाया जा सकता है। कहीं ये स्वास्थ्य विभाग की नई वसूली नीति तो नहीं?
पत्रकार महोदय ने पूरे आत्मविश्वास और हल्की थरथराहट (क्योंकि ₹300 गए थे) के साथ थाने में शिकायत दर्ज कराई है और प्रशासन से अपील की है कि इस घटना की गंभीरता से जांच हो। उन्होंने यह भी लिखा है कि यदि पत्रकार सुरक्षित नहीं, तो आम नागरिकों की हालत का अंदाजा लगाना कठिन नहीं।
अब सवाल ये उठता है कि जब मंत्री की प्रेस कॉन्फ्रेंस में ही ऐसी घटना घट सकती है तो बाक़ी जगहों पर क्या “प्रेस” की जगह “प्रेसर” नहीं बन रहा है?
इस पूरे घटनाक्रम पर मंत्री जी ने तो अभी तक कुछ नहीं कहा, लेकिन ₹300 की यह चोरी, प्रेस की स्वतंत्रता से बड़ा सवाल ज़रूर पूछती है – क्या जेब की सुरक्षा भी अब प्रेस की कवरेज में शामिल होगी?
समाज में जब पत्रकार की जेब से रुपये उड़ जाएं और कोई आवाज़ न उठे, तब यह सिर्फ चोरी नहीं, लोकतंत्र के जेबकतरों की जीत होती है। उम्मीद है कि पुलिस इस मामले को ‘हवा’ में उड़ने नहीं देगी और कोई “ठोस कदम” उठाएगी – कम से कम 300 कदम तो ज़रूर।
Author: mantantra24





