सिस्टम पर सीधा प्रहार: शिक्षा मंत्री के ‘अपनों’ पर मेहरबानी या नियमों की बलि? स्थानांतरण के खेल में भ्रष्टाचार की बू!
रायपुर/बलरामपुर/रामहरि गुप्ता: छत्तीसगढ़ के शिक्षा विभाग में इन दिनों ‘नियम’ कागजों तक सीमित रह गए हैं और ‘रसूख’ जमीन पर बोल रहा है। ताज़ा मामला स्कूल शिक्षा विभाग में हुए उन संशोधनों का है, जिसने विभाग की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। आरोप सीधे शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव पर लग रहे हैं कि उन्होंने नियमों को ताक पर रखकर, बिना जॉइनिंग के ही चहेते अधिकारियों को उनकी मनचाही जगह पर दोबारा पदस्थ कर दिया।

क्या है पूरा मामला?
विदित हो कि छत्तीसगढ़ स्कूल शिक्षा विभाग मंत्रालय द्वारा 26 सितंबर 2025 को एक स्थानांतरण आदेश जारी किया गया था। इस आदेश के तहत बलरामपुर जिले में शिकायतों के घेरे में आए तीन प्रमुख चेहरों को जिले से बाहर भेजा गया था:
- सदानंद कुशवाहा (प्रभारी बीईओ, रामचंद्रपुर): इनका स्थानांतरण जिला शिक्षा अधिकारी बस्तर के विकल्प पर किया गया था।
- राम प्रकाश जायसवाल (DMC, बलरामपुर): इन्हें प्रतिनियुक्ति से वापस लेते हुए शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बड़ेमुरमा (जगदलपुर, बस्तर) भेजा गया था।
- मनोहर लाल जायसवाल (ADPO, बलरामपुर): इन्हें प्रतिनियुक्ति से वापस लेकर जिला शिक्षा अधिकारी गौरेला-पेंड्रा-मरवाही के विकल्प पर भेजा गया था।
नियमों की धज्जियाँ: बिना जॉइनिंग के ही ‘घर वापसी’

नियम कहता है कि यदि किसी कर्मचारी का स्थानांतरण राज्य स्तर पर होता है, तो उसे नई जगह पर कम से कम एक वर्ष तक सेवा देनी अनिवार्य होती है। लेकिन यहाँ कहानी पलट गई। आरोप है कि इन तीनों अधिकारियों ने अपनी नई पदस्थापना पर जॉइनिंग तक नहीं दी और मंत्रालय से आदेश संशोधित करवा लिया।
संशोधन के बाद की स्थिति:
- राम प्रकाश जायसवाल को बस्तर के बजाय बलरामपुर के ही वाड्रफनगर (हाई स्कूल केसारी) में पदस्थ कर दिया गया।
- मनोहर लाल जायसवाल को जीपीएम भेजने के बजाय बलरामपुर के वाड्रफनगर (हाई स्कूल रघुनाथनगर) में जगह मिल गई।
- सदानंद कुशवाहा को बस्तर की जगह पड़ोसी जिले सूरजपुर के प्रतापपुर (गोवर्धनपुर) में पदस्थापना दे दी गई।
भ्रष्टाचार के आरोप और सुलगते सवाल

इस त्वरित ‘संशोधन’ ने विभाग में हड़कंप मचा दिया है। चर्चा है कि इस पूरी प्रक्रिया के पीछे “मोटी रकम” का खेल हुआ है। सवाल यह उठता है कि:
- जब शिकायत के आधार पर इनका तबादला दूर किया गया था, तो कुछ ही दिनों में ऐसा क्या बदल गया कि उन्हें फिर से उनके मनचाहे क्षेत्र के पास भेज दिया गया?
- क्या विभाग के मुखिया ही नियमों को कुचलने में लगे हैं?
- ”सैयां भए कोतवाल, अब डर काहे का” वाली कहावत यहाँ सटीक बैठ रही है। अगर मंत्री स्तर पर ही ऐसी ‘मेहरबानियां’ होंगी, तो निचले स्तर के कर्मचारियों से ईमानदारी की उम्मीद कैसे की जा सकती है?
निष्कर्ष
यह मामला केवल तीन तबादलों का नहीं है, बल्कि उस सिस्टम पर प्रहार है जो आम शिक्षक के लिए कठोर और रसूखदारों के लिए लचीला है। क्या शासन इस मामले की उच्च स्तरीय जाँच कराएगा या ‘अंधेर नगरी-चौपट राजा’ का खेल बदस्तूर जारी रहेगा? आने वाला समय बताएगा कि प्रशासन इस ‘संशोधन कांड’ पर क्या कार्रवाई करता है।
Author: mantantra24




