पशुओं के अस्पताल में तानाशाही का ताला:पशु चिकित्सकों और पशुओं पर उप संचालक का अत्याचार
सुनील शर्मा/ कोरिया जिले के पोड़ी बचरा में स्थित पशु चिकित्सालय पिछले 15 दिनों से बंद हैं, क्योंकि वहाँ के तीनों कर्मचारी—डॉ. सौरव बनर्जी, तिवारी लाल बेक और निलेश्वर तिवारी—को बर्ड फ्लू की रोकथाम के लिए जिले की सीमा पर वाहनों की चेकिंग के काम में लगा दिया गया था। जब मन तंत्र ने इस खबर को दिखाया तो इस लापरवाही की खबर ने क्षेत्र में हलचल मचा दी थी। लेकिन उसके बाद प्रशासन ने जो कदम उठाया, वह सुधार की दिशा में नहीं, बल्कि तानाशाही की मिसाल बन गया।
उप संचालक की तानाशाही: सुधार नहीं, अत्याचार

11 अप्रैल 2025 को जारी एक आदेश (क्रमांक 970) में कोरिया जिला प्रशासन ने उन डॉक्टरों को, जो पहले से ही 9-10 घंटे की कठिन ड्यूटी कर रहे थे, वाहन चेकिंग के बाद पशु चिकित्सालय खोलने का फरमान सुना दिया। भारत में श्रम कानूनों के तहत कार्य के घंटे निर्धारित हैं। एक डॉक्टर, जो पहले से ही 10 घंटे की ड्यूटी कर रहा है, उससे अतिरिक्त कार्य की उम्मीद करना न केवल अनुचित है, बल्कि यह तानाशाही का स्पष्ट प्रतीक है। प्रशासन ने व्यवस्थाओं में सुधार करने की बजाय, पहले से ही थके-हारे चिकित्सकों पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया। उप संचालक के इस तानाशाही भरे आदेश से डाक्टरों ने क्षुब्ध होकर उनके फैसले का विरोध कर दिया और सिर्फ एक ही जगह पर ड्यूटी करने का फैसला किया,नतीजतन पशु अस्पताल के हालात जस के तस बने हुए हैं और सभी नियमों को ताक पर रख,पशु चिकित्सालय पिछले 15 दिनों से भी अधिक समय से बंद है और पोड़ी तहसील के अंतर्गत आने वाले 33 ग्राम पंचायत के गांव वासी परेशानियों का सामना करने को मजबूर है। तो आप ही बताइए की क्या उपसंचालक का यह आदेश पशुओं और चिकित्सकों दोनों के प्रति असंवेदनशीलता नहीं है?
पशु चिकित्सकों का हाल: थकान के कगार पर

डॉ. सौरव बनर्जी (सर्जन), तिवारी लाल बेक (सहायक),जो पहले ही बर्ड फ्लू की रोकथाम के लिए गर्मी में पेड़ों के नीचे वाहन चेकिंग का काम कर रहे हैं, अब उन्हें बिना किसी अतिरिक्त सहायता के अस्पताल भी चलाना होगा। यह न सिर्फ उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, बल्कि पशुओं को मिलने वाली चिकित्सा की गुणवत्ता को भी प्रभावित करेगा। एक थका हुआ डॉक्टर कैसे पूरी क्षमता से मूक प्राणियों की सेवा कर सकता है? उप संचालक ने पहले जहां एक तरफ कलेक्टर कोरिया को धोखे में रखा और दूसरी तरफ न तो स्टाफ की कमी को दूर करने की कोशिश की,और न ही कोई वैकल्पिक व्यवस्था की। बस एक आदेश थोप दिया, जो तानाशाही से कम नहीं। क्या किसी व्यक्तिगत कारणों से उप संचालक विभा सिंह बघेल के द्वारा सिर्फ 1अस्पताल को टारगेट कर वहां कार्य कर रहे डाक्टरों को दुर्भावनावश परेशान कर रहीं हैं,यह सवाल भी उठता हैं क्योंकि बाकी जिले के डॉक्टरों को उनके निकटवर्ती अस्पताल में रह कर ही चेकिंग का कार्य दिया गया हैं और पोड़ी पशु चिकित्सालय से डाक्टरों को 40 किलोमीटर दूर जाकर के कार्य करना पड़ रहा हैं??
पशुओं की अनसुनी चीखें!!

जब चिकित्सक थकान के कगार पर होंगे, तो उन पशुओं का क्या होगा, जो इस भीषण गर्मी में डिहाइड्रेशन, हीटस्ट्रोक और दुर्घटनाओं का शिकार हो रहे हैं? सड़कों पर भटकते गाय, भैंस और कुत्ते अपनी पीड़ा को शब्दों में बयाँ नहीं कर सकते, लेकिन उनकी आँखों में दिखने वाला दर्द किसी से छिपा नहीं है। प्रशासन की इस तानाशाही व्यवस्था ने न सिर्फ चिकित्सकों को हाशिए पर धकेल दिया, बल्कि उन मूक प्राणियों की जिंदगी को भी खतरे में डाल दिया।
एक समाज के रूप में हमारा कर्तव्य

पशु चिकित्सक हमारे समाज के अनमोल हिस्से हैं, जो मूक प्राणियों की सेवा में दिन-रात जुटे रहते हैं। लेकिन जब प्रशासन उनकी मेहनत की कद्र करने की बजाय उन पर अत्याचार करता है, तो यह हमारी सामूहिक संवेदनशीलता पर सवाल खड़ा करता है। हमें यह समझना होगा कि यह सिर्फ एक अस्पताल के खुलने-बंद होने की बात नहीं, बल्कि एक ऐसी व्यवस्था की बात है, जो तानाशाही रवैये के साथ इंसान और पशु दोनों की जिंदगी से खिलवाड़ कर रही है।
आवाज उठाने का समय

अब वक्त है कि इस तानाशाही के खिलाफ आवाज बुलंद की जाए। प्रशासन से सवाल किया जाए कि क्या यह उचित है कि पहले से 10 घंटे ड्यूटी कर रहे चिकित्सकों पर अतिरिक्त बोझ डाला जाए? क्यों नहीं स्टाफ की कमी को पूरा किया गया? क्यों नहीं वैकल्पिक व्यवस्थाएँ की गईं? पशु प्रेमियों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय नेताओं को इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाना होगा। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि न तो चिकित्सकों का शोषण हो, और न ही पशुओं की जिंदगी खतरे में पड़े। कोरिया पशु उप संचालक का यह तानाशाही भरा आदेश निंदनीय है। व्यवस्थाओं में सुधार की बजाय, वह चिकित्सकों और पशुओं, दोनों के प्रति असंवेदनशीलता दिखा रहें है।
Author: mantantra24





