“मुख्यमंत्री शहरी स्लम स्वास्थ्य योजना” मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की ऐसी परिकल्पना जिसमें स्लम बस्तियों में निवासरत लोगों का इलाज उनके घर पर ही हो सके। सीधे-सीधे शब्दों में कहा जाए तो ऐसे लोग जो गंदी बस्तियों पर रहते हैं गंदी बस्तियां मतलब की झुग्गी झोपड़ियां,मैली कुचली गलियां जिन जगहों पर स्वास्थ्य के बारे में जानकारियां काफी कम होती है और अगर ऐसे लोग बीमार होते हैं तो उनका अच्छे तरीके से इलाज नहीं हो पाता है और उन्हीं लोगों को ध्यान पर रखकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस योजना को 1 नवंबर 2020 को लागू किया था

इस योजना के अंतर्गत मोबाइल मेडिकल यूनिट पर चिकित्सक पैरामेडिकल टीम मेडिकल उपकरण के साथ-साथ महंगे लैब टेस्ट को भी शामिल किया गया जो एक गरीब व्यक्ति के द्वारा नहीं कराया जा सकता था।
निश्चित रूप से यह योजना काफी अच्छी थी और शुरुआती दौर पर इस योजना का काफी अच्छा क्रियान्वयन भी किया गया आपको देना चाहेंगे यह योजना ट्रिपल पी मॉडल पर चालू की गई थी और और इस योजना के संचालन के लिए भव्या हेल्थ सर्विस प्राइवेट लिमिटेड विजयवाड़ा आंध्रप्रदेश की कंपनी है उसे ठेके पर संचालन हेतु दिया गया और तभी से शुरू होता है भ्रष्टाचार का खेला…
भव्या हेल्थ सर्विस प्राइवेट लिमिटेड की वेबसाइट ही लगती है संदिग्ध
भव्य हेल्थ सर्विस किस साइड खोलने पर सबसे पहले छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और उनके साथ साथ आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी की फोटो दिखाई देती है और उसमें तरह-तरह के कैटेगरी दिखाई देती हैं जिसमें यह कंपनी कार्य करती है
लेकिन किसी भी कैटेगरी को खोलने पर कोई भी कोई परिणाम नहीं आते हैं।
भव्य हेल्थ सर्विस की साइट पर देखने से पता चलता है कि किस तरह से यह कंपनी छत्तीसगढ़,सिक्किम,आंध्र प्रदेश, उड़ीसा,तेलंगाना,केरल,तमिलनाडु जैसे राज्यों पर अपनी सर्विस उपलब्ध कराती है लेकिन किसी भी राज्य की साइट खोलने पर इस वेबसाइट पर कोई भी जानकारी प्रोवाइड नहीं होती है।
7-9-2017 को रजिस्टर्ड हुई इस साइट पर देखने से आप आसानी से पता लगा सकते हैं कि किस तरह से यह कंपनी महज 6 सालों में 6 राज्यों पर काम करती हुई दिखाई दे सकती है और यह सभी राज्य दिल्ली पर बैठी हुई सरकार के विपक्ष की भूमिका पर है आखिर ऐसा क्या है जों कंपनी 6 साल पहले रजिस्टर्ड होती है और देखते-देखते 6 राज्यों पर अपने कार्य का विस्तार कर लेती हैं और मजेदार बात यह है कि आप भव्य हेल्थ सर्विस की साइट पर जाकर देखेंगे तब पता चलेगा कि इसके पूरे के पूरे विद्यार्थी भारत के नहीं है।

और इसमें जितने भी फोटो लगाई गई हैं, जितने भी कमेंट डाले गए हैं वह भारत के नहीं है।

राज्य सरकार करती है लगभग 216,000,000/- रुपए का भुगतान
औसतन एक मोबाइल मेडिकल यूनिट पर प्रति माह तीन लाख से ज्यादा खर्च होता है जिसमें एक एमबीबीएस डॉक्टर सहित तीन पैरामेडिकल स्टाफ और एक ड्राइवर होता है और छत्तीसगढ़ सरकार की जनसंपर्क विभाग के अनुसार प्रदेश भर में 60 मेडिकल यूनिट कार्यरत हैं तो उस हिसाब से अगर कम से कम प्रति महीने का भुगतान ₹300000 भी माना जाए,हम यह तीन लाख इसलिए कह रहे हैं क्योंकि इसकी कहीं भी सटीक जानकारी जनसंपर्क विभाग की साइट पर नहीं है,सूत्रों के अनुसार इसका भुगतान तीन लाख से ज्यादा होता है लेकिन अगर औसतन तीन लाख भी एक यूनिट का भुगतान माना जाए तो साल का आंकड़ा 216,000,000/- रुपए होता है।

गरीबों के नाम पर,गंदी बस्तियों के नाम पर,उनको स्वास्थ्य देने के नाम पर इतने बड़े राशि का आवंटन राज्य सरकार करती है और यह पैसा कहीं ना कहीं ऐसे ही गरीबों के टैक्स का ही होता है, जिस सुविधा का लाभ गरीब और स्लम अगर हिंदी में बोला जाए तो गंदे इलाकों पर रहने वाले लोगों को मिलना चाहिए था वह लाभ संबंधित कंपनी और इससे जुड़े हुए अधिकारियों को मिलता हुआ दिखाई दे रहा है,तो क्या ईडी का रुख इस और भी जाना चाहिए या नहीं जाना चाहिए यह तो प्रदेश की जनता ही बताएगी।
तो आप समझ सकते हैं की स्वास्थ्य जैसे गंभीर क्षेत्र पर यह भव्या हेल्थ सर्विस नाम की यह कंपनी कार्य करती है और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर ही भ्रष्टाचार होता है आइए हम बताते हैं कि यह कैसे होता है…
कागजों पर 41 तरह की पैथोलाजी जांच लेकिन होती हैं सिर्फ सामान्य जांच बाहरी जांच को ना..
इस योजना के अंतर्गत इस मोबाइल मेडिकल यूनिट में एक एमबीबीएस डॉक्टर और साथ में पैरामेडिकल टीम का होना जरूरी है जिस पर 41 प्रकार के पैथोलॉजी जांच और 170 प्रकार की दवाइयां उपलब्ध होनी चाहिए।
लेकिन मोबाइल मेडिकल यूनिट के द्वारा सिर्फ छोटी मोटी जांच की जाती है और जिन जांचों को बाहर भेजना होता हैं जो की बड़े-बड़े अस्पतालों पर महंगे दामों पर होती है वह जांच नहीं की जाती है जबकि शासन द्वारा स्पष्ट निर्देश है कि सभी प्रकार की जांच करना जरूरी हैं और इसके साथ साथ 170 प्रकार की जो दवाइयां इस मेडिकल यूनिट पर होनी चाहिए वह भी दवाइयां इस मोबाइल मेडिकल यूनिट से गायब होते हैं। कोई भी उच्च अधिकारी किसी भी समय पर अवलोकन करके इस बात को सिद्ध कर सकता है कि किसी भी मोबाइल मेडिकल यूनिट पर 41 प्रकार की जांच नही होती है और ना ही 170 प्रकार की दवाइयां उपलब्ध होती है।

छत्तीसगढ़ प्रदेश के लगभग सभी जिलों पर यही हालात आपको देखने को मिल जाएंगे ताजा घटनाक्रम में एमसीबी और कोरिया जिले पर इस तरह की अवस्थाएं और घोटाला आपको देखने को कहीं भी मिल सकता है,स्लम बस्ती से आए हुए मजदूर जब इस मेडिकल मोबाइल यूनिट पर बड़ी उम्मीदों के साथ आते हैं लेकिन कहीं ना कहीं सरकार की इस महत्वकांक्षी योजना से अपने आप को लाभान्वित होता नही पाते हैं,फलस्वरुप इन को फिर से उन्हीं बड़ी-बड़ी अस्पतालों में और बड़े-बड़े पैथोलॉजी लैब पर जाकर महंगे दामों पर अपना जांच कराना पड़ता है जबकि यह सुविधा शासन की तरफ से पूर्णता निशुल्क: है।
नाम ना छापने की शर्त पर मोबाइल मेडिकल यूनिट के चिकित्सक ने हमे बताया कि कंपनी के द्वारा हम पर दबाव बनाया जाता है कि मोबाइल मेडिकल यूनिट में जो जांच उपलब्ध है उसी जांच को किया जाए,बाहरी जांचों को कम किया जाए जिससे कंपनी का पैसा बचे।
शहरों के बीच में ही फेंका जा रहा हैं बायोमेडिकल वेस्ट
चिरमिरी नगरी निकाय क्षेत्र,मनेंद्रगढ़ क्षेत्र और बैकुंठपुर चर्चा क्षेत्र में बीते ढाई साल से इस योजना का संचालन हो रहा है लेकिन यहां पर अब तक बायोमेडिकल वेस्ट मैनेजमेंट का कोई प्रबंधन नहीं है।

मोबाइल मेडिकल यूनिट से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थों को कहीं पर भी खुले में फेंक दिया जा रहा है जिस पर आज तक पर्यावरण विभाग नगरी प्रशासन विभाग एवं स्वास्थ्य विभाग की नजर नहीं पड़ी है या यूं कहें कंपनी को मनमानी की छूट देकर जिम्मेदारों ने अपनी आंख बंद कर ली है। अगर संबंधित विभाग चाहे तो इस लापरवाही के लिए ठेका कंपनी के ऊपर लाखों का जुर्माना भी लगाया जा सकता है क्योंकि जिम्मेदारों के साथ साठगांठ होने की वजह से अब तक इस पर भी कोई कार्यवाही नहीं की गई।
मोबाइल मेडिकल यूनिट में जरूरत की सामग्री का अभाव
प्रत्येक मोबाइल मेडिकल यूनिट को बेहतर संचालन के लिए एक RFP तैयार किया गया है जिसमें आवश्यक सामग्रियों की एक लिस्ट है और उस लिस्ट के मुताबिक सामग्री उपलब्ध नहीं होने पर संबंधित कंपनी पर जुर्माना का भी प्रावधान है,लेकिन यहां संचालन दिनांक से लेकर अब तक सामग्री का अभाव बना हुआ है,पैथोलॉजी लैब में रिएजेंट की कमी समेत कई अन्य आवश्यक सामग्रियों की कमी बनी रहती है। लेकिन SUDA द्वारा नियुक्त एरिया प्रोजेक्ट मैनेजर एवं योजना संचालन के नोडल अधिकारी के मिलीभगत की वजह से अब तक कोई बड़ी कार्यवाही नहीं की गई है जिसकी वजह से संबंधित कंपनी संचालक अपनी मनमानी तरीके से इस योजना का संचालन कर रहे हैं और सरकार की इस महत्वकांक्षी योजना पर पलीता लगा रहे है
प्रत्येक जिले के कलेक्टर होते हैं इस मोबाइल मेडिकल यूनिट के मुखिया
मुख्यमंत्री शहरी स्लम स्वास्थ्य योजना कि देखरेख का जिम्मा उस जिले के कलेक्टर के पास होता है अगर प्रशासन चाहे तो इस तरह की अवस्थाओं को तत्काल तौर पर इसका निराकरण कर सकता है।
सरकार की इस महत्वकांक्षी और इतनी खर्चीली योजना को अगर सही तरीके से लागू नहीं किया जाता तो कहीं ना कहीं यह हमारे प्रदेश के टैक्स के पैसों की बर्बादी मात्र है जिस तरह से प्रदेश के मुखिया ने इसकी परिकल्पना की थी वह भव्या हेल्थ सर्विस जो कि छत्तीसगढ़ पर इस योजना को क्रियान्वित करने वाली कंपनी है उसके द्वारा मुख्यमंत्री की परिकल्पना को धूमिल करने की कोशिश जरूर की जा रही है।
Author: mantantra24





